Thursday, December 17, 2009

निरयन-सायन गणित भेद

ज्योतिष मे दो प्रकार की गणित प्रचलित है। प्रथम निरयन व द्वितीय सायन। भारत मे निरयन गणित का प्रयोग ज्यादा किया जाता है। निरयन गणित के अनुसार वर्षमान 365 दिन, 6 घण्टा, 9 मिनट, 10 सैकण्ड है अर्थात् 365.25636 दिन है। इस गणित से लगभग 20 मिनट कम वर्षमान ऋतु आधारित सायन गणित होती है। जिसका वर्षमान 365 दिन, 5 घण्टा, 48 मिनट, 46 सैकण्ड है अर्थात् 365.2422 दिन है।
दुनिया मे चलने वाले सभी केलेण्डर सायन वर्षमान पर आधारित है। पर भारतीय केलेण्डर मे निरयन गणित के कारण प्रतिवर्ष लगभग 20 मिनट का अन्तर रहता है। यह भूल कई वर्षो मे ज्यादा हो जाती है जैसे 72 वर्षो मे लगभग एक दिन ज्यादा होता है। जिसे इस प्रकार समझे कि एक दिन मे 24 घण्टे होते है 24 घण्टे मे 60 का गुणा करने पर 1440 मिनट हुए तथा प्रति वर्ष 20 मिनट का अन्तर होने से 1440 मे 20 का भाग देने पर 72 वर्ष आते है। ऋतु को एक दिन पूर्व शुरू होने मे 72 वर्ष लगते है तो एक माह पूर्व शुरू होने मे 72 गुणा 30 करने से 2160 वर्ष होगे। वर्तमान मे हमारा निरयन गणित से चलने वाला केलेण्डर 24 दिन आगे चल रहा है। तथा इस गणित को सही करना हो तो केलेण्डर मे से 24 दिन हटा देने होगे। अर्थात् एक चान्द्रमास हटाना होगा परन्तु हमारे गणित मे ऐसा प्रावधान नही है। परन्तु हमारे केलेण्डर मे से एक चान्द्रमास हटाने का सरल तरिका यह है कि हम एक अधिक मास हटा दे। यदि हम एक बार अधिक मास हटा दे तो सामान्य व्यक्ति को इसका ज्ञान भी नही होगा तथा गणितीय भूल भी सही हो जायेगी
अड्.गेजी केलेण्डर मे भी वर्षमान की यह भूल थी। जिसे पोप ग्रेगरी ने 1852 मे केलेण्डर मे से 10 दिन एक साथ हटा कर ठीक किया था। तभी से यह केलेण्डर ग्रेगेरियन केलेण्डर के नाम से पहचाना जाता है। यह भूल पुन: होगी इस हेतु पोप ग्रेगरी ने लीप इयर मे सुधार करते हुए नियम बनाया कि 400 वर्ष मे 100 लीप इयर आते है जिसमे 3 लीप इयर कम किये जाये और 97 लीप इयर ही किये जाये अर्थात् जिस वर्ष मे 400 का भाग जाता हो उसे लीप इयर नही माना जाये तो गणित की भूल सुधरती जायेगी।
पोप ग्रेगरी ने 10 दिन काट कर अपने केलेण्डर को सही करने का प्रयत्न किया परन्तु भारतीय गणितज्ञ एक अधिक मास कम करके अपनी गणितीय भूल को सुधारने हेतु न एक मत है न ही तैयार है। यह कितना बडी बात है। इस भूल का ज्ञान सामान्य व्यक्ति को नही हो सकता है परन्तु गणित के जानकारो को यह ज्ञान नही हो इसे कैसे माना जा सकता है। आज भारत मे कई प्रकार के अयनाश या गणित का प्रयोग किया जाता है जैसे ब्रह्मपक्ष, चित्रापक्ष, केपी, रमण आदि जिससे अयनाश मे अन्तर आता है परिणामस्वरूप नक्षत्रमान मे विभिन्नता रहती है। जिसका परिणाम प्रत्यक्ष रूप से कुण्डली मे देखने को मिलता है अर्थात् ग्रहो के राशि परिवर्तन मे अलग-अलग केलेण्डर अलग-अलग समय या दिन दर्शाते है। शुक्रास्त, शुक्रोदय आदि के दिनो मे भी परिवर्तन देखने को मिलता है।
हम इसको सरल तरिके से देखे तो रवि उत्तरायन सायन गणित से 22 दिसम्बर को होता है परन्तु हम उसे 14 जनवरी को मानते व मनाते है। चूकि लगभग 72 वर्षो तक एक ही तारीख को मकर सक्राति मनाने से लोगो को इसका वास्तविक ज्ञान नही होता लेकिन अब जब यह पर्व 15 जनवरी को शुरू हो रहा है तो यह जानने की उत्सुकता बढेगी कि यह परिवर्तन क्यो हो रहा है। जिसका सीधा उत्तर हम दे चूके है कि जो प्रति वर्ष 20 मिनट का अन्तर आ रहा है जिससे वर्तमान मे हम 24 दिन आगे चले रहे है जिससे 22 दिसम्बर मे 24 दिन जोडने से 15 जनवरी को मकरेर्क माना जायेगा। अब तब यह गणित 23 दिन के अन्तर से चली रही थी जिससे मकरेर्क 14 जनवरी को मनाते आ रहे है।
हमारे प्राचीन ग्रथ सूर्यसिद्धान्त मे सायन गणित को ही दर्शाया गया है। जिसको स्पष्ट करने हेतु जो केलेण्डर मे सूर्य क्रान्ति दिखाई गई है उसे देखे। सूर्य की क्रान्ति सायन मे ही होगी निरयन से उसका कोई सम्बन्ध नही है। स्पष्ट देखने पर 20/21 मार्च वसन्त सम्पात, 21/22 जून कर्क सक्रान्ति, 23/23 सितम्बर शरदसम्पात तथा 22 दिसम्बर मकरेर्क लिखा होता है। परन्तु इस समय निरयन सूर्य एक राशि पूर्व का लिखा होता है। इससे स्पष्ट होता है कि सायन गणित ही प्राकृतिक है। जब क्रान्ति शून्य होती है तब सूर्य मेष राशि पर शून्य पर ही हो ऐसा सायन मे ही होता है।
सार रूप मे यह कहना चाहता हू कि भारत के महान गणितज्ञो को इस पहलू पर विचार करना चाहिए तथा एक मत से उसका हल निकालना चाहिए। निरयन व सायन के साथ भारत मे विभिन्न प्रकार के गणित व पक्षो के प्रयोग से अलग-अलग पन्चाड्.गो मे विविध गणितागणित से बनने वाली कुण्डली मे अन्तर देखने को प्राप्त हो रहा है जिससे आम ज्योतिषी या सामान्य लोग दुविधा मे पडते है जिसका निदान जरूरी है। जैसे किसी केलेण्डर मे जिस तारीख को अमुक ग्रह राशि परिवर्तन कर रहा है या शुक्रास्त वगैरह हो रहा है वही दूसरे केलेण्डर मे दूसरे दिन होता है जिससे आम जन को परेशानी हो रही है। जिसका पूरे भारतवर्ष मे एक सूत्र या पक्ष की गणित को सरकारी मान्यता देकर अपनाना चाहिए।

2 comments:

  1. बहुत अच्छी जानकारी। धन्यवाद।

    ReplyDelete
  2. आचार्य दार्शनेय लोकेश 9412354036

    यह जानकर खुशी है कि आपको पञ्चाङ्गों की त्रुटि का संज्ञान है। यद्यपि इस त्रुटि को सही करने के लिए जो आप सुझाव दे रहे हैं उससे हम सहमत नहीं हैं। हम २२-२३ वर्षों से पञ्चाङ्ग सुधार के विषय पर काम कर रहे हैं और विगत 15 वर्षों से हम एक शोधित गणित से किया गया पञ्चाङ्ग प्रकाशित कर रहे हैं जिसमें क्रान्ति साम्य युक्त सौर सङ्क्रान्तियों के आधार पर ही और सौर एवं चान्द्र मासों की यथावत गणित की गई है। हमारे पञ्चाङ्ग का एक और परिष्कृत रूप यह है कि हमने नक्षत्रों को वेद के अनुसार २८ की गणित में ही लिया है और उनको उनकी यथावत परिमाप के साथ लिया है। आप अपना पता भेजें तो एक प्रति आपको भेजना चाहेंगे क्योंकि आपके संज्ञान में हमारे प्रयास का आना सम्भव है कुछ लाभकर सिद्ध होवे। धन्यवाद।

    ReplyDelete